मन के दो पंख तृष्णा और वासना पंडित अजय नाथ मिश्र, लोक सभा देवरिया ६६ ( जौरा बाजार)

संपादक अखिलेश कुमार द्विवेदी 9 टीवी समाचार भारत UP बिहार MEDIA 

हरे कृष्ण मित्रों!!!

मन एक पंछी की तरह है। इस पंछी के दो पंख हैं तृष्णा और वासना जो तुमको उड़ाकर या तो भविष्य में ले जाता है या भूतकाल में ले जाता है।

मन के भीतर छुपा होता है लोभ और मोह। लोभ का अर्थ होता है जो मुझे अभी नहीं मिला है, वह मिले। मोह का अर्थ होता है मेरा, मतलब जो मिल गया है, वह छूट न जाए। मन चाहता है कि जो है उसे पकड़ कर रखूं, वह छूट न जाए और जो नहीं है, वह भी मेरी पकड़ में आ जाए।

एक हाथ में जो है उसे सम्हाले रखूं और एक हाथ उस पर फैलाता रहूं जो मेरे पास नहीं है। मोह लोभ की छाया है क्योंकि जो तुम्हें नहीं मिला है उसे पाना है और जो मिल गया है उसे पकड़ कर रखना है।

इन्हीं दो के बीच आदमी खींचा-खींचा मर जाता है। मन के ये दो पंख तृष्णा और वासना व्यक्ति को नर्क में उतार देते हैं और वह नष्ट हो जाता है।

तुम अपने अनुभव पर खुद गहराई से चिंतन करो कि तुम्हारा अनुभव क्या कहता है तुम अपने अनुभव को स्वयं परखो। जब भी तुमने कुछ पकड़ना चाहा तभी तुम दुखी और अशांत हुए हो।

इस संसार में सब क्षणभंगुर है। पकड़ा कुछ भी नहीं जा सकता है और तुम पकड़ना चाहते हो। तुम प्रकृति के विपरीत चलते हो इसलिए हारते हो। हारने में दुख है।

जैसे कोई आदमी नदी के धार के विपरीत तैरने लगे तो शायद हाथ दो हाथ तैर भी जाए। लेकिन कितना तैर सकेगा? थकेगा और टूटेगा। थोड़ी ही देर में धार की विराट शक्ति उसकी शक्ति को छिन्न भिन्न कर देगी। वह थकेगा, हारेगा, पैर उखड़ने लगेंगे और नीचे की तरफ बहने लगेगा, तब विषाद घेरेगा कि हार गया। जो चाहिए था, नहीं पा सका।

तब चित्त में बड़ी ग्लानि होगी। दुख गहन होगा। जो जानता है, वह नदी की धार के साथ बहता है। वह कभी हारता ही नहीं फिर कैसा दुख? वह नदी की धार को शत्रु नहीं मानता, उसका सहारा साधता है। शांति आती कैसे है? शांति की शुरुआत स्वयं के भीतर से होती है। ध्यान के अभ्यास से मन को स्वांसों की धार के साथ बहाने और स्वांसों का सहारा साधने से आती है।

निरंतर अभ्यास से एक पल ऐसा आता है कि मन स्वांसों के साथ एकाकार हो जाता है और उसी पल स्वयं के बोध से शांति का अनुभव हो जाता है।

राधे राधे!!! पंडित अजय नाथ मिश्रा

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